कौन कहता है की आसमन में छेद नहीं हो सकता ,तवियत से एक पत्थर तो उछालो यारो
कौन कहता है की आसमन में छेद नहीं हो सकता ,तवियत से एक पत्थर तो उछालो यारो इस कहावत को चरितार्थ कर दिखाया है एक ऐसी लड़की जिसने MBA कि पढाई पूरी करने के बाद नौकरी करने के बजाय चुन लिया शिक्षा के क्षेत्र में समाज सेवा कर उजाला पहुचने की वीणा | और पहुच गयीजनपद सोनभद्र के एक ऐसे गाँव में जंहा शिक्षा का दूर -दूर तक कोई वास्ता नहीं है ,जिसके कारण गाँव में विकाश भी कोसो दूर है |शिक्षित लड़की ने अपने दोस्तों व माता -पिता के सहयोग से गाँव में रहकर बच्चो व बड़ो के बीच जला रही है शिक्षा की अलख |
मिटटी के कमरे में चल रहा यह स्कूल कोई सरकारी स्कूल नहीं है और ना ही सरकार द्वारा प्राप्त धन से चल रहा है बल्कि MBA कि पढाई पूरी करने के बाद शिक्षा के क्षेत्र में समाज सेवा करने वाली गुंजन सिंह द्वारा निःशुल्क चलाया जा रहा है | सरकार भले ही शिक्षा का अधिकार कानून लाने की बात कर रही है लेकिन क्या शिक्षा का अधिकार का कानून लाना मात्र ही शिक्षा का सुधार होना है ? यह एक बहुत बड़ा सवाल है | जनपद सोनभद्र में नक्सल प्रभावित इलाके होने के कारण सरकार द्वारा शिक्षा के विकाश के लिए कई महत्वपूर्ण योजनाये लागू की गयी ,लेकिन नक्सल प्रभावित जनपद सोनभद्र में कई इलाके आज भी ऐसे है जहा शिक्षा की किरण नहीं पहुच पाया है ,और यही कारण है की उस गाँव में विकाश की कोई रोसनी भी नहीं पहुच सकी है ,है ऐसा ही एक उदहारण चोपन ब्लाक विकास खण्ड के पनारी ग्रामपंचायत अन्तरगत अमरसोता गाँव में देखा जा सकता है जंहा शिक्षा के नाम पर कोई भी स्कूल नहीं है और शायद यही कारण है की जिस गाँव में शिक्षा नहीं पहुच सका उस गाँव में विकाश के बारे में सोचना भी बेमानी होगी ,चोपन विकास खण्ड से लगभग 50 किलोमीटर दूर अमरसोता गाँव में पहुचने के लिए नाव से नदी पार करना ही एक मात्र विकल्प है विकास के नाम पर उस गाँव में ना सड़क है और ना ही पीने के लिए पानी की कोई सुबिधा | गाँव विडम्बना यह है की दुरूह क्षेत्र होने के कारण इस गाँव में ना कोई अधिकारी पंहुचा ना कोई जनप्रतिनिधि | प्रधान भी जीतने के बाद एक बार ही पहुच सका ,इस गाँव का मुख्य रोजगार खेती व लकड़ी बेचना है इस गाँव के लोग इलाज के नाम पर जड़ी बूटी का ही प्रयोग करते हो दूर -दूर तक चिकित्सा की कोई सुबिधा नहीं है | लोगो को बाजार करने के लिए नदी के सहारे ३० किलोमीटर दूर ओबरा जाना पड़ता है | इसी गाव में शिक्षा का अलख जगा रही है यह समाज सेविका | कभी इस गाव के बच्चो व बड़ो के हाथो में सिर्फ नाव कि पतवार होती थी लेकिन अब इस गाव कि तस्वीर बदलने लगी है और अब उन्ही के हाथो में स्लेट और पेन्सिल है | जो बच्चे सही से अपना नाम तक नहीं बता पाते थे वे आज A B C D.......... व क ख ग घ ......... पढ़ रहे है | इतना ही नहीं जो महिलाये कभी अपना चौखट पार कर बाहर नहीं आयी वे इस स्कूल में आ कर पढ़ रही है और काफी कुछ सीख भी ली है | अब उस गाव की जादातर महिलाये अंगूठा लगाने के बजाये अपना दस्खत करती है | गाव की फिजा बदलने से बड़े - बूढ़े सभी खुश है | इस्पूरे माहौल को बदलने वाली समाज सेविका का कहना है कि वे सोनभद्र को तब से जानती है जब उनकी माता कोन के एनम के पद पर नौकरी करती थी | उसका कहना है कि वे इस क्षेत्र के लिए पहले से ही सोची थी और MBA कि पढाई पूरी करने के बाद वे शहर में नौकरी करने के बजाये सोनभद्र में शिक्षा के क्षेत्र काम करने का मान बनाया और अपने माँ-बाप व दोस्तों के सहयोग से सोनभद्र के चोपन थाना इलाके के पनारी ग्राम पंचायत अंतर्गत अमरसोता गाव को चुन कर यहाँ शिक्षा के क्षेत्र में उतर गयी |
समाज सेवा के रूप में इस लड़की ने ना सिर्फ शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रही है बल्कि लोगो को मुख्य धारा जे जुड़ कर समाज सेवा करने का प्रेरणा भी दे रही है | बताते चले कि कुछ माह पूर्व इसी इलाके के गुरमुरा के पास नक्सलियो द्वारा रेलवे ट्रैक काटे जाने कि बात सामने आयी थी | ऐसे मे समाज सेवा के लिए इस सेविका ने दुरूह गांव मे रहा कर ग्रामीणों के बीच उनकी मदद कर रही है | समाज सेविका ने बताया कि गांव मे लोगो का सहयोग भी मिल रहा है| उसने बतया कि जिस मिटटी के घर मे वह स्कूल चला रही है वह ग्रामीणों द्वारा निःशुल्क दिया गया है | गांव मे रह कर भोजन कि व्यवस्था भी ग्रामीणों द्वारा ही किया जाता है |
समाज सेविका ने यह भी बताया कि इस गांव मे कई दिक्कते है जिसमे मुख्य रूप से पानी ओर सड़क कि दिक्कते है | उसने बताया कि जब से वह स्कूल संचालित कर रही है तब से इस गांव मे ना कोई अधिकारी आया और ना ही कभी प्रधान |
कई बुजुर्ग महिलाये भी पढ़ने के लिए आती है उनका कहना है कि पढ़ने मे मन लगाता है और घर जा कर नतिनी को भी पढ़ा लेती है |महिलाये व बच्चे अब उनके हांथो मे किताब व स्लेट पेन्सिल आ गयी है | कभी घर कि चौखट पार न करने वाली अनीता व् सीता स्कूल जा कर पढने लगी है उनका कहना है कि पढ़ने से उनको सभी जानकारी हो गयी है अब वे अपना नाम लिख कर दस्तखत कर लेती है
गांव मे निःशुल्क शिक्षा व्यवस्था खुलने कि चर्चा दूर दूर तक होने लगी और उसका असर भी दिखने लगा | गांव कि कई अनपढ़ महिलाये शादी होने के बाद ससुराल से माइके पढ़ने के लिए आ गयी | वही गाव कि बहुए भी पढ़ने के लिए स्कूल आने लगी है उनका कहना है वे पढ़ लिख कर घर पर अपने बच्चो को शिक्षित करेंगे | नक्सल प्रभावित जनपद होने के कारण ऐसे दुरूह इलाको मे ही नक्सली अपना ठिकाना बनाते है ऐसे मे अनपढ़ और गंवार बच्चो को पार्टी मे सामिल कर लेना उनके लिए और भी आसन हो जाता है |इस अमरसोता गांव कि स्थिति भी कुछ एसी ही है जंहा बच्चे कभी स्कूल तक नही गये | नाव कि पतवार चलाने व गाय भैस करने मे ही पूरा दिन निकाल जाता था | लेकिन अब उनके भी हाथो मे पेन्सिल व स्लेट ने जगह ले ली है अब वही गंवार बच्चे गाय भैस चराने के बजाय स्कूल आने लगे है और इतना ही नही वहा पंहुच कर स्कूल कि सुरुवात हम होंगे कामयाब एक दिन के प्रार्थना से करते है | कभी अपना नाम न बता पाने वाले बच्चे अब A B C D ........व अ आ इ ई भी पढ़ने लगे है| वे सभी जानकारी पूछने पर तुरंत बता देते है |
ग्रामीणों का कहना है कि इस गांव मे इलाज कि कोई सुविधा नही है यहा के लोग जड़ी बूटी पर ही आश्रित है इस गांव मे आज :--तक कोई भी चिकित्सा व्यवस्था नही पंहुचा | इस पुरे मामले पर जब बेसिक शिक्षा अधिअरी से बात कि गयी तो उन्होंने गांव मे जाकर बच्चो के जरुरत की सामग्री निःशुल्क देने की बात कही उन्हों ने कहा की सरकार द्वारा दी जारही सभी सुविध्ये उस गांव मे पहुचाई जायेगी उन्होंने कहा की प्रस्ताव भेज कर

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